योग मुद्रा

योग मुद्रा और उससे होने वाले स्वास्थ्य लाभ

योगा केवल वजन कम करने और खुद को फिट रखने वाला व्यायाम भर ही नहीं बल्कि यह एक प्राचीन कला भी है। यह आधुनिक विज्ञान के साथ संतों के ज्ञान को जोड़ती है और हमें स्वास्थ् लाभ पहुंचाती है। योग में ना सिर्फ आसन ही शामिल है बल्कि मुद्राएं भी अपना अहम किरदार निभाती हैं।

इन योग मुद्राओ से आप कई प्रकार के स्वास्थ् लाभ उठा सकते हैं। हर योग मुद्रा विशिष्ट है जिनका रोज सही प्रकार से अभ्यास करना चाहिये। हर योग मुद्रा में एक गहरा रहस् छुपा हुआ है। अगर आप इन मुद्राओं को नियमित रूप से करेगें तो, आपके शरीर में वायु बनने की बीमारी भी दूर हो जाएगी।

माइग्रेन से राहत दिलाने वाले योग के 8 आसन इन योग मुद्राओं को अकेले शांति में बैठ कर करनी चाहिये। हर योग मुद्रा को करने का अपना अलग समय होता है। आइये देखते हैं इन बेसिक योग मुद्राओं से शरीर को होने वाले स्वास्थ् लाभ।


ज्ञान मुद्राः यह मुद्रा ज्ञान और ध्यान के लिये जानी जाती है। यह मुद्रा सुबह के समय पद्मासन में बैठ कर करनी चाहिये। इससे ध्यान केंद्रित करने, अनिद्रा दूर करने तथा गुस्से को कंट्रोल करने में सहायता मिलती है।


वायु मुद्राः यह मुद्रा शरीर में वायु को नियंत्रित करने के लिये की जानी चाहिये। यह मुद्रा बैठ कर, खडे़ हो कर या फिर लेट कर दिन में किसी भी समय कर सकते हैं। यह पेट में गैस की समस्या को दूर करती है।


अग्नी मुद्राः मुद्रा शरीर में अग्नी तत्व को नियंत्रित करने के लिये की जाती है। यह सुबह के समय खाली पेट करनी चाहिये। यह वजन घटाने और पाचन ठीक रखने के लिये अच्छी होती है।



वरून मुद्राः यह शरीर में जल तत्व को नियंत्रित करने के लिये होती है। इस मुद्रा को कर के आपका चेहरा सुंदर दिख सकता है। इससे चेहरा चमकदार और चेहरे में नमी बरकरार रहेगी।



प्राण मुद्राः यह जिंदगी से जुड़ी मुद्रा होती है, जिसे दिन में कभी भी कर सकते हैं। इस मुद्रा से आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढेगी, आंखे तेज होंगी और शरीर की थकान मिटेगी।



पृथ्वी मुद्राः यह मुद्रा शरीर में खून के दौरे को ठीक रखता है और साथ ही यह हड्डियों को और मासपेशियों में मजबूती लाता है।


शून्य मुद्राः यह मुद्रा खासतौर पर आपके कानों के लिये महत्वपूर्ण है। इससे आपके कानों का दर्द ठीक हो सकता है। और उम्र बढ़ने की वजह से कम सुनाई देने की बीमारी भी ठीक हो सकती है।



सूर्या मुद्राः यह मुद्रा सुबह के समय किया जाना चाहिये, जिससे सूर्य की उर्जा आपके शरीर में समा सके।



लिंग मुद्राः यह मुद्रा पुरुषों के लिये अच्छी मानी जाती है। यह पुरुष के शरीर को गर्म रखती है और कामवासना को बढाती है।

अपान मुद्राः यह मुद्रा बहुमुखी है जो कि हर किसी को लाभ पहुंचाती है। यह मुद्रा शरीर में जहरीले द्रव् से छुटकारा दिलाती है। यह मुद्रा मूत्र संबन्धि समस्या को दूर करती है और पाचन क्रिया को दुरुस्त बनाती है।

पांच प्रमुख योग मुद्रा

मुख, नाक, आंख, कान और मस्तिष्क को पूर्णत: स्वस्थ्य तथा ताकतवर बनाने के लिए हठ योग में पांच प्रमुख मुद्राओं का वर्णण मिलता है। सामान्यजनों को निम्नलिखित मुद्राओं का अभ्यास किसी जानकार योग शिक्षक से सीखकरही करना चाहिए। वैसे यह मुद्राएं सिर्फ साधकों के लिए हैं जो कुंडलिनी जागरण कर सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।

ये पांच प्रमुख मुद्राएं हैं- 1.खेचरी (मुख के लिए), 2.भूचरी (नाक के लिए), 3.चांचरी (आंख के लिए), 4.अगोचरी (कान के लिए), 5.उन्मनी (मस्तिष्क के लिए) खेचरी से स्वाद् अमृततुल्य होता है। भूचरी से प्राण-अपान वायु में एकता कायम होती है। चांचरी से आंखों की ज्योति बढ़ती है और ज्योतिदर्शन होते हैं। अगोचरी से आंतरिक नाद का अनुभव होता है और उन्मनी से परमात्मा के साथ ऐक्य बढ़ता है। उक्त सभी से पांचों इंद्रियों पर संयम कायम हो जाता है।

1.खेचरी- इसके लिए जिभ और तालु को जोड़ने वाले मांस-तंतु को धीरे-धीरे काटा जाता है, अर्थात एक दिन जौ भर काट कर छोड़ दिया जाता है। फिर तीन-चार दिन बाद थोड़ा-सा और काट दिया जाता है। इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा काटने से उस स्थान की रक्त शिराएं अपना स्थान भीतर की तरफ बनाती जाती हैं। जीभ को काटने के साथ ही प्रतिदिन धीरे-धीरे बाहर की तरफ खींचने का अभ्यास किया जाता है।

इसका अभ्यास करने से कुछ महिनों में जीभ इतनी लम्बी हो जाती है कि यदि उसे ऊपर की तरफ उल्टा करें तो वह श्वास जाने वाले छेदों को भीतर से बन्द कर देती है। इससे समाधि के समय श्वास का आना-जाना पूर्णतः रोक दिया जाता है।

2.भूचरी- भूचरी मुद्रा कई प्रकार के शारीरिक मानसिक कलेशों का शमन करती है। कुम्भक के अभ्यास द्वारा अपान वायु उठाकर हृदय स्थान में लाकर प्राण के साथ मिलाने का अभ्यास करने से प्राणजय होता है, चित स्थिर होता है तथा सुषुम्ना मार्ग से प्राण संस्पर्श के ऊपर उठने की संभावना बनती है। 

3.चांचरी- सर्वप्रथम दृष्टि को नाक से चार अंगुल आगे स्थिर करने का अभ्यास करना चाहिए। इसके बाद नासाग्र पर दृष्टि को स्थिर करें, फिर भूमध्य में दृष्टि स्थिर करने का अभ्यास करें। इससे मन एवं प्राण स्थिर होकर ज्योति का दर्शन होता है।

4.अगोचरीशरीर के भीतर नाद में सभी इंद्रियों के साथ मन को पूर्णता के साथ ध्यान लगाकर कान से भीतर स्थित नाद को सुनने का अभ्यास करना चाहिए। इससे ज्ञान एवं स्मृति बढ़ती है तथा चित्त एवं इंद्रियां स्थिर होती हैं। 

5.उन्मनीसहस्त्रार (जो सर की चोटी वाला स्थान है) में पूर्ण एकाग्रता के साथ मन को लगाने का अभ्यास करने से आत्मा परमात्मा की ओर गमन करने लगती है और व्यक्ति ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ने लगता है।

चेतावनी- यह आलेख सिर्फ जानकारी हेतु है। कोई भी व्यक्ति इसे पढ़कर करने का प्रयास ना करें, क्योंकि यह सिर्फ साधकों के लिए है आम लोगों के लिए नहीं। या फिर किसी जानकर योग टीचर के देख रेख में करे|


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